| चौघड़िया | प्रकार | समय |
|---|---|---|
| उद्वेग | अशुभ | 05:56 – 07:33 |
| चर | सामान्य | 07:33 – 09:10 |
| लाभ | शुभ | 09:10 – 10:47 |
| अमृत | शुभ | 10:47 – 12:24 |
| काल | अशुभ | 12:24 – 14:01 |
| शुभ | शुभ | 14:01 – 15:38 |
| रोग | अशुभ | 15:38 – 17:15 |
| उद्वेग | अशुभ | 17:15 – 18:52 |
| चौघड़िया | प्रकार | समय |
|---|---|---|
| शुभ | शुभ | 18:52 – 20:15 |
| रोग | अशुभ | 20:15 – 21:38 |
| उद्वेग | अशुभ | 21:38 – 23:01 |
| चर | सामान्य | 23:01 – 00:24 |
| लाभ | शुभ | 00:24 – 01:47 |
| अमृत | शुभ | 01:47 – 03:10 |
| काल | अशुभ | 03:10 – 04:33 |
| शुभ | शुभ | 04:33 – 05:56 |
पंचांग संस्कृत के दो शब्दों से बना है — "पंच" यानी पाँच और "अंग" यानी भाग। हिंदू कालगणना में हर दिन को पाँच अंगों से मापा जाता है: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इन्हीं पाँचों से किसी दिन की शुभता तय होती है और मुहूर्त निकाला जाता है।
चंद्रमा और सूर्य के बीच के 12 अंश के अंतर को एक तिथि कहते हैं। एक महीने में 30 तिथियाँ होती हैं — 15 शुक्ल पक्ष की (अमावस्या से पूर्णिमा तक) और 15 कृष्ण पक्ष की (पूर्णिमा से अमावस्या तक)।
आकाश को 27 भागों में बाँटा गया है, हर भाग एक नक्षत्र है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो, वही जन्म नक्षत्र कहलाता है और नामकरण, विवाह मिलान तथा मुहूर्त में इसका बड़ा महत्व है।
सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है, और वार के अनुसार एक भाग राहु काल होता है। इस अवधि में नया कार्य, यात्रा या शुभ कार्य आरंभ करने से बचा जाता है। इसी तरह यमगण्ड और गुलिक काल भी अशुभ माने जाते हैं। रोज़मर्रा के काम इनमें चलते रहते हैं — केवल नई शुरुआत टाली जाती है।
दिन और रात को चार-चार घड़ी के आठ भागों में बाँटकर चौघड़िया बनता है। अमृत, शुभ और लाभ शुभ माने जाते हैं, चर सामान्य, जबकि रोग, काल और उद्वेग से बचा जाता है। यात्रा या नया काम शुरू करने के लिए यह सबसे आसान तरीका है।
यह पंचांग स्विस एफेमेरिस से गणना किया जाता है और चुने हुए शहर के वास्तविक सूर्योदय-सूर्यास्त पर आधारित है।