काल सर्प दोष जन्म कुंडली की एक विशेष स्थिति है जो तब बनती है जब सातों मुख्य ग्रह — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि — राहु और केतु के एक ही ओर आ जाएँ। राहु और केतु (चंद्रमा के दो छाया-बिंदु) हमेशा एक-दूसरे के ठीक सामने (180°) रहते हैं और मिलकर एक "अक्ष" बनाते हैं — जब सभी ग्रह इस अक्ष के एक तरफ "बँध" जाते हैं, तो यह "साँप के मुँह और पूँछ के बीच फँसे" जैसा माना जाता है।
राहु जिस भाव में हो, उसी से काल सर्प दोष का नाम व प्रभाव-क्षेत्र तय होता है:
नहीं। काल सर्प दोष को लेकर बहुत भय फैलाया जाता है, पर यह कोई श्राप नहीं। यह एक कर्मिक पैटर्न है जो जीवन में अचानक उतार-चढ़ाव व विलंब ला सकता है, लेकिन धैर्य व मेहनत से यही व्यक्ति को असाधारण एकाग्रता व सफलता देता है। मज़बूत गुरु या शुभ ग्रहों की दृष्टि इसे बहुत हल्का कर देती है।
मुख्य उपायों में भगवान शिव की उपासना, महामृत्युंजय मंत्र, सोमवार व नाग पंचमी पर नाग देवता को जल/दूध अर्पण, और काल सर्प निवारण पूजा (त्र्यंबकेश्वर) शामिल हैं। रत्न (गोमेद/लहसुनिया) केवल विशेषज्ञ परामर्श के बाद।
यह जाँच स्विस एफेमेरिस से निकाली गई राहु-केतु व ग्रहों की वास्तविक स्थिति पर आधारित है — कोई अनुमान नहीं। सटीक परिणाम हेतु सही जन्म समय व स्थान डालें।